परहित सरिस धर्म नहिं भाई

परहित सरिस धर्म नहिं भाई :-  मनुष्य वह है जिसमें मनुष्यता हो जो आत्म केंद्रित एवं स्वार्थी है अभी मनुष्यता से कोसों दूर है मानव का सही पहचान परम से ही होती है जो किसी और के काम ना आ सके 


वह किसी काम का नहीं परामर्श सबसे बड़ा धर्म है अपने लिए तो सभी जीते हैं जो दूसरों के लिए जीता है उसी का जीना सार्थक है वह स्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में ठीक ही कहा है

परहित सरिस धर्म नहिं भाई
परम पीड़ा सम नहिं अधमाई

अर्थात् परमात्मा से बड़ा कोई धर्म नहीं है और परपीड़न से बड़ी कोई निशिता नहीं है प्रकृति अपने लिए ना जी कर दूसरों के लिए जीवित है वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते नदियां अपना जल स्वयं नहीं पीती इसी प्रकार सज्जन परमार्थ सभी के लिए जीते हैं